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कर्मचारियों की पुरानी पेंशन बहाल करने का सरकार का कोई विचार नहीं

  • पुरानी पेंशन स्कीम कर्मचारियों के बुढ़ापे का सुरक्षा कवच था, जिसे भाजपा सरकार ने छीन लिया- दीपेन्द्र हुड्डा  
  • जब राजस्थान, छत्तीसगढ़ की सरकार OPS लागू कर सकती है तो बाकी सरकारें क्यों नहीं कर सकती – दीपेन्द्र हुड्डा
  • हरियाणा में BJP सरकार ने OPS बहाल करने से इनकार कर दिया है, लेकिन कर्मचारी चिंता न करें हमारी सरकार आते ही हम OPS लागू करेंगे – दीपेन्द्र हुड्डा
  • मौजूदा सरकार कर्मचारी विरोधी, सरकार की गलत नीतियों से कर्मचारी खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे – दीपेन्द्र हुड्डा

चंडीगढ़, 28 मार्च सांसद दीपेन्द्र हुड्डा ने राज्य सभा में सरकार से सवाल किया कि क्या सरकार पुरानी पेंशन योजना को फिर से शुरू करने की कर्मचारियों की मांगों को पूरा करते हुए इसे शुरू करेगी, जिस पर प्रधानमन्त्री कार्यालय में राज्य मंत्री डॉ जितेन्द्र सिंह ने जवाब दिया कि 1 जनवरी, 2004 को या उसके बाद कार्यभार ग्रहण करने वाले केन्द्रीय सरकार के कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन बहाल करने का सरकार का कोई विचार नहीं है।

 

दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा कि इसके विपरीत, कई राज्य सरकारें वापस पुरानी पेंशन नीति लागू कर रही हैं। उन्होंने कहा कि हरियाणा में भाजपा सरकार ने पुरानी पेंशन योजना बहाल करने से इनकार कर दिया है, लेकिन कर्मचारियों को चिंतित होने की जरूरत नहीं है हमारी सरकार आते ही हम OPS लागू करेंगे। दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा कि पुरानी पेंशन स्कीम कर्मचारियों के बुढ़ापे का सुरक्षा कवच था, जिसे भाजपा सरकार ने छीन लिया। कर्मचारियों की समझ में आ गया है कि पुरानी पेंशन स्कीम को ख़त्म करने से उनका बुढ़ापा खराब हो जाएगा। अपना बुढ़ापा सुरक्षित करने के लिए ही कर्मचारी संगठन पुरानी पेंशन बहाल करने की मांग कर रहे हैं।

 मौजूदा सरकार कर्मचारी विरोधी है। सरकार ने कर्मचारियों के भविष्य को असुरक्षित बाज़ार के हवाले कर दिया है। सरकार की इन्हीं गलत नीतियों से कर्मचारी खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। NPS के तहत कर्मचारियों के खून-पसीने की कमाई शेयर बाज़ार के जोखिम पर लगी होती है, जो कर्मचारी हितों के खिलाफ है। दीपेन्द्र हुड्डा ने कर्मचारियों के देशव्यापी हित में पुरानी पेंशन योजना बहाल करने की मांग की।

सांसद दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा कि देशभर के कर्मचारी जानते हैं कि नयी पेंशन स्कीम 1 जनवरी 2004 को अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्त्व वाली भाजपा सरकार ने लागू की थी। उस वक्त इसे पुरानी स्कीम से बेहतर बताया गया था और दावा किया गया था कि यह कर्मचारियों के लिए ज्यादा लाभकारी है। इसलिए कई राज्य सरकारों ने भी इसे अपनाया था। लेकिन, 2014-15 आते-आते इसके दुष्परिणाम दिखने लगे और स्पष्ट हो गया कि नयी पेंशन स्कीम कर्मचारियों के लिए हितकारी नहीं है। नयी स्कीम के तहत रिटायर होने वाले कर्मचारियों को पेंशन के नाम पर कुछ नहीं मिल रहा है। कर्मचारियों को NPS के भयंकर नतीजों का पता था इसलिए देश भर के कर्मचारी NPS लागू होने के खिलाफ लगातार आंदोलन कर रहे हैं और पुरानी पेंशन योजना बहाल करने की मांग कर रहे हैं। लेकिन सरकार लगातार उनकी मांगों को अनसुना कर रही है।

सांसद दीपेन्द्र ने NPS की खामियों को गिनाते हुए कहा कि NPS में आकस्मिक जरुरत पड़ने पर किसी भी कर्मचारी को अपना पैसा निकालने का प्रावधान नहीं है। जिसकी वजह से उन्हें कठिन पारिस्थितियों में अनेक दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, NPS के तहत पारिवारिक पेंशन खत्म, GPF की कोई सुविधा नहीं मिलती, वेतन से हर महीने 10% पैसा काट लिया जाता है, रिटायरमेंट बाद निश्चित पेंशन की कोई गारंटी नहीं; कर्मचारी को कितनी पेंशन मिलेगी यह बात स्टॉक मार्केट और इंश्योरेंस कंपनियों पर निर्भर करेगी। NPS में पेंशन बीमा कंपनी देगी, किसी भी मुद्दे पर बीमा कंपनी से लड़ना पड़ेगा। NPS में महंगाई और पे-कमीशन का फायदा नहीं मिलेगा। रिटायरमेंट के बाद मेडिकल भत्ता बंद, मेडिकल बिलों की प्रतिपूर्ति नहीं होगी।

उन्होंने यह भी सवाल किया कि विशेषज्ञों का कहना है कि राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) के अंतर्गत आर्थिक मंदी पेंशन को प्रभावित कर सकती है क्योंकि यह बाज़ार से जुड़ी हुई है और NPS के अंतर्गत पुरानी पेंशन योजना की भांति सेवानिवृत्त कर्मचारियों के लिए कोई उचित सुरक्षा नहीं है – जिसपर सरकार ने जवाब दिया कि आर्थिक मंदी के समय पेंशन धन के किसी भी संभावित ह्रास के सापेक्ष अंशदाता के हितों के रक्षा के लिए, डिफाल्ट योजना में इक्विटी / इक्विटी से जुड़े उपकरणों का अनावरण केवल 15% तक सीमित किया गया है, जो डिफ़ॉल्ट मोड़ में सरकारी अंशदाताओं को उपलब्ध कराया गया है। 15% की सीमा से अधिक का इक्विटी एक्सपोज़र केवल उन अंशदाताओं के लिए उपलब्ध है जो डिफ़ॉल्ट योजना से बाहर निकलते समय व्यक्तिगत निवेश विकल्प का चयन करते हैं। इसके अलावा, जोखिम से बचने वाले अंशदाता अपने शत प्रतिशत अंशदान को सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश के विकल्प का चयन कर सकते हैं।

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