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किसान विरोधी कानूनों के खिलाफ आर-पार की जंग-किसानों ने सिंघु व् टिकरी बॉर्डर पर डाले डेरे

The war against the anti-farmer laws - the farmers encamped on the Singhu and Tikari borders

अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) का बयान 
– पंजाब और हरियाणा के किसान भारी संख्या में गोलबंद होकर पहुंच रहे हैं
– उ0प्र0 व उत्तराखण्ड के किसान भी ने दिल्ली मं प्रवेष किया
– किसान नेताओं ने गृह मंत्रालय व केन्द्रीय खुफिया एजेंसियों के माध्यम से वार्ता के प्रयास की निन्दा – कहा सर्वोच्च राजनीतिक स्तर पर वार्ता हो
– किसान संगठनों ने किसानों से भारी संख्या में दिल्ली कूच करने की अपील की
– सभी किसान पक्षधर, कारपोरेट विरोधी ताकतों से समर्थन की अपील की, अखिल भारतीय गोलबंदी तेज की जाएगी, 1 दिसम्बर से राज्यों में विरोध आयोजित होगा

किसान एकताबद्ध हैं और एक सुर में केन्द्र सरकार से तीन किसान विरोधी, जनविरोधी कानूनों, जो कारपोरेट के हित की सेवा करते हैं और जिन्हें बिना चर्चा किए पारित किया गया तथा बिजली बिल 2020 की वापसी की मांग कर रहे हैं। किसान शांतिपूर्वक व संकल्पबद्ध रूप से दिल्ली पहँुचे हैं और अपनी मांग हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। पंजाब और हरियाणा से वे भारी संख्या में सिंघु व टिकरी बार्डर पर पहुंच रहे हैं। उत्तराखंड व उ0प्र0 के किसानों की गोलबंदी भी सिंघु बार्डर पर हो रही है।

जिस तरह से अब तक दिल्ली चलो का आह्नान सामने आया है, किसानों का कहना है कि जाहिरा तौर पर सरकार ने उनकी मांगों और सवालों पर कोई ध्यान नहीं दिया है।

देश के किसानों ने तय करके दिल्ली में भारी संख्या में विरोध जताया क्योंकि सरकार ने सितम्बर 2020 से जारी किये गये उनके ‘‘दिल्ली चलो’’ आह्नान के बाद हुए देशव्यापी विरोध कार्यक्रमों पर कोई ध्यान नहीं दिया। उन्होंने स्थानीय स्तर पर देश भर में बहुत सारे विरोध आयोजित किये, जबकि दिल्ली के आसपास के किसान राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की ओर आगे बढ़ रहे हैं। किसानों ने दिल्ली पहुंचने की बहुत विस्तारित तैयारी की हुई है पर उन्हें एक दमनकारी अमानवीय व असम्मानजनक हमलों का सामना करना पड़ा है, जिसमें सरकार ने उनके रास्ते में बहुत सारी बाधाएं डालीं, पानी की बौछार की, आंसू गैस के गोले दागे, लाठीचार्ज किया और हाईवे खोद दिये। सरकार में पैदा हुए अविश्वास व भरोसे की कमी के लिए सरकार खुद भी जिम्मेदार है।

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अब तीन काले कानून और बिजली बिल 2020 वापस लेने की मांग पर अपनी प्रतिक्रिया देने की जगह सरकार इस प्रयास में है कि बहस का मुद्दा यह बने कि किसान कहां रुकेंगे? हम देख रहे हैं कि पूरे शहर में पुलिस तैनात की गयी है जिससे विरोध कर रहे किसान और दिल्ली की जनता भी आतंक और संदेह के माहौल में आ गयी है। किसानों के रास्ते में लगाए गये बैरिकेट अब भी नहीं हटाए गये हैं।

अगर सरकार किसानों की मांगों को सम्बोधित करने पर गम्भीर है तो उसे शर्तें लगाना बंद कर देना चाहिए (किसान संगठित ढंग से बुरारी जाएं, फिर हम अगले दिन वार्ता शुरु करेंगे), यह मान कर नहीं चलना चाहिए कि वार्ता का अर्थ है कि ‘‘किसानों को इन कानूनों के लाभ समझाए जाएं’’ और उसे सीधे तौर पर बताना चाहिए कि उसके पास क्या समाधान है। किसान अपनी मांगों पर बहुत स्पष्ट हैं।

एआईकेएससीसी ने मांग की है कि सरकार को तुरंत ही इस मामले में राष्ट्रीय खुफिया एजेंसियों व गृहमंत्रालय की दृष्टि से सम्बोधित करना बंद कर देना चाहिए। सरकार ने जोर जबरदस्ती से इन कानूनों को संसद में पारित घोषित कर दिया है और किसान उम्मीद करते हैं कि इसका समाधान राजनैतिक होगा जो सरकार के सर्वोच्च स्तर से आएगा। सरकार का गृहमंत्रालय को शामिल करने का प्रस्ताव किसानों के लिए एक धमकी के अलावा कुछ नहीं है और यह उसकी ईमानदारी के प्रति कोई विश्वास पैदा नहीं करता।

एआईकेएससीसी के वर्किंग गु्रप ने सभी किसान संगठनों से अपील की है कि तुरंत दिल्ली की ओर किसानों की गोलबंदी तेज करें। उसने सभी कारपोरेट विरोधी, किसान पक्षधर ताकतों से अपील की है कि वे एक साथ मिलकर विरोध आयोजित करें। अखिल भारतीय गोलबंदी को तेज करने के साथ-साथ उसने 1 दिसम्बर 2020 से राज्य स्तर पर विरोध आयोजित करने की अपील की है।

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आम जन के लिए जरूर कुछ कठिनाईयां व असुविधाएं उत्पन्न हो गयी हैं पर किसान दिल्ली, हरियाणा व उ0प्र0 के आम लोगों के द्वारा दिये जा रहे जोश-खरोश के साथ व्यापक समर्थन का स्वागत करते हैं। हम पंजाब और हरियाणा के किसानों की इस गोलबंदी को सलाम करते हुए कहना चाहते हैं कि उनके संघर्ष में देश के किसान समुदाय और खेती को बचाने में उन्होंने बड़ा योगदान दिया है। जिन लोगों ने इस आन्दोलन में अपनी जान की कुर्बानी दी है वे जीवन भर हमारे लिए प्रेरणा के स्रोत बने रहेंगे। हमारे संघर्ष का रास्ता शांतिपूर्वक जनगोलबंदी का है और बना रहेगा।

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