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जब युवरानी साहब ने मेरे हाथ में पिस्टल देकर कहा टारगेट पर ‘फायर करो’

मेरे लिए वो दिन सबसे सुनहरे दिनों में शुमार हो

 

वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद वशिष्ठ की कलम से

गया,जब अलवर रियासत की राजमाता अति सम्मानीय युवरानी महेंद्र कुमारी जी ने मुझे हाथ में पिस्टल पकड़ा कर फूलबाग महल में निशाना लगाना सिखाया। भले ही ये ट्रेनिंग चंद लम्हों की थी लेकिन मेरे लिए किसी बड़े स्वप्न से कम नहीं। इतनी सादगी,शराफत, सौम्य व्यवहार, प्रजा से अटूट लगाव कम ही राजघरानों में देखने को नहीं मिलता।

युवरानी महेंद्र कुमारी

बात 90 के दशक की है,युवरानी जी का संदेश प्राप्त कर मैं फूलबाग गया। वहां महल में सम्भवत पहली मंजिल पर पिस्टल शूटिंग कोर्ट बना हुआ था,करीब 10-15 फिट पर टारगेट व सफेद धागे बंधे कोर्ट में युवरानी जी हाथ में पिस्टल लिए प्रैक्टिस कर रही थीं। मुझे महल में ऊपर बुला लिया। खड़े-खड़े बातचीत के बीच वे बोलीं,प्रमोद पिस्टल चलाओगे? राजमाता का ये सवाल सुन मैं झिझका,अगले पल उन्होंने मेरे हाथ में लोडेड प्रैक्टिस पिस्टल थमा दी, झिझकते हुए मैंने निशाना लगाया जो टारगेट से कहीं दूर लगा। जब दो बार निशाना नहीं लगा तो वे पीछे खड़ी हो गईं और मेरा हाथ पकड़ कर कहा, एक आंख बंद करो, फिर हाथ में पिस्टल सैट की,कहा फायर करो,वाकई इस फॉयर की गोली ने टारगेट का लगभग करीबी भाग छू लिया था। मैंने कई फॉयर किये। गोली युवरानी साहब डालती गईं। मैं मां ममता ये सुनहरे पल यहां इसलिए साझा कर रहा हूँ कि एक इतनी बड़ी हस्ती,राजमाता इतनी सहज थीं कि छोटे से व्यक्ति को भी इतना सम्मान, महत्व देना नहीं भूलती। उस दिन युवरानी साहब के व्यवहार ने मुझे कई शिक्षा दी,व्यक्ति विचारों व्यवहार,सादगी से बड़ा होता है।

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युवरानी महेंद्र कुमारी

आमतौर मैं फूलबाग बुलावे पर जाता था। 1998 में जब वे निर्दलीय चुनाव में जीती बाजी हार गईं तो ज्यादातर अखबारों ने बड़ी कड़ी न्यूज़ लिखी। जाहिर है, राजघराने का मामला था तो खबर उल्टी-सीधी चलनी ही थीं। दो दिन बाद मुझसे रहा नहीं गया क्योंकि अंतर लगभग ढाई हजार रहा होगा तो लोकसभा में इतने वोट मायने नहीं रखते। मैं दैनिक भास्कर में था,ऊपरी इजाजत लेकर दूसरे दिन स्टोरी लिखी ‘खूब लड़ी मर्दानी वो तो….? युवरानी जी बोली,प्रमोद मैं तो साधारण इंसान हूं, जिसको इंगित कर स्टोरी लिखी वे सदियों में एक पैदा होती हैं,उनका इशारा महारानी लक्ष्मी बाई पर था।आप अचंभा करेंगे विरोधी दलों के नेताओं ने भी मुझे फोन किये कि वाकई युवरानी साहब इस स्टोरी की हकदार थीं। फूलबाग में लोगों की उस दिन भीड़ जमा हो गई,मुझे कुछ साथियों ने वहां विशेष रूप से बुलाया। ऐसे कई वाकये युवरानी साहब के साथ मेरी यादगार हैं,जब भँवर जितेंद्र सिंह जी को पहला चुनाव लड़ाना था तो मुझे भी विशेष रूप से बुलाकर चर्चा की,क्या रहेगा क्योंकि चुनाव तो चुनाव है? उस दिन एक मां के चेहरे पर अपने बेटे की हार-जीत से ज्यादा आमजन की सेवा को लेकर भविष्य की चिंता ज्यादा झलकी। ऐसे वाकये आपके साथ साझा करने के पीछे मेरा उद्देश्य सिर्फ युवरानी साहब की सादगी, उनके व्यवहार,अलवर की जनता की चिंता,उनके प्रति प्रेम को उजागर करना है। वे प्रचार से ज्यादा कार्य करने में ज्यादा विश्वास रखती थीं। देखा जाए तो उनके पास किसी भी क्षेत्र में क्या कमीं थी लेकिन उन्होंने जनसेवा के लिए राजनीति को चुना। उन्होंने एक बार फूलबाग में मौजूद लोगों से कहा भी था,’राजनीति सुख भोगने का साधन नहीं,सेवा करने का माध्यम है’। ये अलवर के लिए गर्व व स्वाभिमान की बात है कि ऐसी देवतुल्य हस्ती के कदम अलवर की धरा पर पड़े हैं। इंसान ही नहीं युवरानी साहब का जीवनभर वन्यजीवों से भी विशेष प्रेम रहा। बुजुर्ग बताते हैं कि फूलबाग में बाघ व शेर के शावक थे। सन् 1991 से 96 तक अलवर की सांसद रहते, अलवर का कायाकल्प किया। 6 फरवरी 1942 को बूंदी रियासत के महाराजा कर्नल बहादुर सिंह के घर जन्मी युवरानी साहब एक उदार दिल की महिला थीं। उम्दा व्यक्तित्व, कृतित्व की धनी युवरानी साहब किसी से अपने व्यक्ति की बुराई सुनना पसंद नहीं करती थीं। वे अपने समर्थक की विश्वसनीयता अपनी तराजू में तौलती न कि किसी के बहकावे में। सीधे शब्दों में कहें तो उनको कोई कान का कच्चा नहीं कह सकता। अपने समर्थक पर ठोंक कर विश्वास करना उनकी बड़ी आदत रही। ऐसे लाखों किस्से आज भी लोगों के जहन में होंगे। बुजुर्ग बताते हैं कि घुड़सवारी व निशानेबाजी का शौक उन्हें बचपन से था। विवाह 1962 में अलवर के युवराज प्रताप सिंह जी के साथ हुआ। दो संतान पुत्र भंवर जितेंद्र सिंह एवं पुत्री मीनाक्षी कुमारी हैं। इनके अलवर स्टर्ड नाम से घाेड़ाें की ट्रेनिंग का स्कूल का विदेशों में नाम था। अलवर स्टर्ड के एक घाेड़े ने मुंबई में हुई प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। स्टर्ड में एक डाॅग कैनल भी संचालित था। इसमें विभिन्न प्रजाति के कुत्ते पाले जाते थे।

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फूलबाग में टाइगर के दाे शावक यात्रा व पूजा नाम के थे । इनसे युवरानी साहब का काफी लगाव था। इनके अलावा 10 हाथी, घोड़े, ऊंटों का समूह भी था। युवरानी साहब ने निशानेबाजी में कई स्वर्ण पदक जीते। 27 जून 2002 काे अदभुत प्रतिभा की धनी युवरानी साहब ने दुनिया से विदा ली तो जनसैलाब उमड़ पड़ा। हर शख्स की आंखे नम थी। उनकी सादगी,कुशल व्यवहार,जनप्रेम,मददगार स्वभाव के किस्से आज भी लोगों की जुबां पर है। वाकई,पीढ़ियों तक उनकी याद भुलाई नहीं जा सकती। वशिष्ठ परिवार के तरफ से उनकी पुण्यतिथि पर भावभीनी श्रद्धांजलि।

विलक्षण प्रतिभा की धनी थीं ‘युवरानी साहब’ —-मेरे हाथ में पिस्टल देकर कहा,फायर करो—युवरानी साहब के साथ राजमहल फूलबाग की कुछ यादें—वे कहती थीं, राजनीति सुख भोगने का साधन नहीं,सेवा का माध्यम—पसन्द नहीं थी खुद की बड़ाई सुनना—अपने समर्थक को खुद की तराजू में तौलना मुख्य ध्येय—सादगी,जनप्रेम, अलवर की चिंता,कुशल व्यवहार उनका गहना—

🙏 ‘प्रमोद वशिष्ठ’ पत्रकार।

 

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