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आग की लपटों में फंसे मुशर्रफ ने अंतिम समय दोस्त से कहा, मेरे परिवार को संभालना दोस्त

 

…दोस्त मैं मरने वाला हूं, मेरे परिवार का ख्याल रखना’
– आग की लपटों में फंसे मुशर्रफ ने अंतिम समय पर शोभित से की मोबाइल पर बात

– मौत को सामने खड़ा देखकर फूट फूटकर रो रहा था मुशर्रफ, दोस्त भी लाचार

बिजनौर। ‘फैक्टरी में आग लग गई है और चारों ओर लपटें उठ रही हैं। धुएं के कारण सांस लेना भी मुश्किल है और मदद की कोई उम्मीद भी नहीं। कुछ ही देर में मेरी मौत होने वाली है। मोनू मेरे दोस्त मेरे मरने के बाद मेरे परिवार का ख्याल रखना।’ यह बात दिल्ली की अनाज मंडी में हुए हादसे में मारे गए मुशर्रफ ने अंतिम क्षणों में अपने दोस्त शोभित उर्फ मोनू से मोबाइल फोन पर कही थी।
रविवार सुबह करीब सवा पांच बजे नगीना थाना क्षेत्र के गांव टांडा माईदास निवासी मुशर्रफ की गांव के ही अपने दोस्त शोभित अग्रवाल उर्फ मोनू के मोबाइल फोन पर कॉल आई। मुशर्रफ ने बताया कि फैक्टरी में आग लग गई है और वह आग की लपटों में फंस गया है। चारों ओर धुआं ही धुआं घुटा हुआ है। जिसके कारण सांस लेने में भी मुश्किल हो रही है। ऐसा लग रहा है जैसे कुछ ही क्षणों में उसकी मौत हो जाएगी। उसके साथ कई अन्य साथी भी हैं, किसी के पास बचने का कोई रास्ता नहीं है और मदद की भी उम्मीद टूट चुकी है। मौत को करीब देख मुशर्रफ के सामने अपने मासूम बच्चों का चेहरा, परिवार की उम्मीद और टूटते सपने सब एक साथ खडे़ थे। ऐसे में उसे अपने दोस्त से ही कुछ आशा थी, लेकिन लाचार मोनू भी ऐसे क्षणों में कुछ नहीं कर सका। मुशर्रफ फफक कर रो रहा था और मोनू से कह रहा था कि वह उसके परिवार का हर हाल मेें ख्याल रखे। बात करते करते ही मुशर्रफ की सांसें थम गईं। उधर, शोभित ने यह बात गांव के लोगों को बताई। परिवार और आसपास के लोग तुरंत दिल्ली के लिए रवाना हो जाए।
12 साल से फैक्टरी में नौकरी कर रहा था मुशर्रफ
शोभित और मुशर्रफ में बचपन से गहरी दोस्ती थी। दोनों एक दूसरे के पास खूब उठते बैठते थे। मुशर्रफ जब गांव आता था तो शोभित के पास ही बैठता था। ग्राम प्रधान फुरकान सलीम के मुताबिक मुशर्रफ अपने पिता का इकलौता बेटा था। उसके दो बहनें भी हैं। दोनों की शादी हो गई है। मुशर्रफ के चार बच्चों में आठ साल का बेटा व तीन छोटी बेटी हैं। मुशर्रफ के पिता अब्दुल वाहिद की भी मौत हो चुकी है। मुशर्रफ अपने पीछे मां रहमत, पत्नी इमराना व चार छोटे बच्चों को रोता बिलखता छोड़ गया है। 32 साल का पुत्र मुशर्रफ 2007 से दिल्ली में काम करता था। पिछले तीन साल से वह दिल्ली की अनाज मंडी के पास बैग बनाने की फैक्टरी में बैग बनाने का काम करता था। आठ हजार रुपये महीना उसे वेतन मिलता था। फैक्टरी में ही दिन में बैग बनाने के बाद रात में वह साथियों के साथ सोता था।
ग्रामीणों को घटनास्थल पर नहीं जाने दिया गया
ग्राम प्रधान फुरकान सलीम के मुताबिक घटना की सूचना मिलते ही वह गांव वालों के साथ दिल्ली के लिए रवाना हो गए। घटनास्थल पर पहुंचे तो उन्हें आग लगने वाली जगह पर नहीं जाने दिया गया। किस फैक्टरी में मुशर्रफ काम करता था, फैक्ट्री कहां थी यह कोई बताने को तैयार नहीं है। दिल्ली में उन्हें कोई कुछ नहीं बता रहा है। वह हादसे की जानकारी लेने के लिए इधर उधर भटकते घूम रहे हैं। पर कोई उन्हें कुछ सही नहीं बता रहा और न ही कोई मदद कर रहा है। शोभित से उन्हें मुशर्रफ की मौत का पता चला है।

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