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जाट बिदके तो कई सीटों पर कठिन होगी बीजेपी की राह !

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हरियाणा को जाटों का गढ़ कहा जाता है l हरियाणा की राजनीति में भी जाटों का बोलबाला रहा है l जाटों के सिवाय भी मुख्यमंत्री बने हैं लेकिन चौधरी भजन लाल को छोड़कर कोई भी गैर जाट नेता लंबे समय तक हरियाणा में राज नहीं कर पाया l भजनलाल और बंसीलाल के समय भी हरियाणा की राजनीति जाट-नॉन जाट पर लामबद्ध करने की कोशिशें होती रही हैं, लेकिन 2014 में बीजेपी की जीत के बाद सीएम के तौर पर मनोहर लाल खट्टर की ताजपोशी ने हरियाणा में गैर जाट सियासत को बल मिला l साल 2016 में हुए जाट आरक्षण आंदोलन में हुई हिंसा के बाद तो हरियाणा जाट बनाम नान जाट पॉलिटिक्स की प्रयोगशाला बन गया है l

बीजेपी भले ही नारा दे कि “हरियाणा एक हरयाणवीं” एक पर जिस तरह से बीजेपी ने पूर्व सांसद राजकुमार सैनी को सैय दी उस से हरियाणा के आपसी भाईचारे और बिरादरियों के दिलों में खटास पैदा कर दी l इसके साथ ही बीजेपी का यह भी मानना है कि हरियाणा में जाटों के बिना राजनैतिक सत्ता पर कब्जा करना असंभव है और इसी सोच के चलते बीजेपी ने जाट वोटरों में सेंध लगाने के लिए कई महत्वपूर्ण पद इस समाज के नेताओं को दिए हैं.

‘जाट’ समुदाय हरियाणा की कुल आबादी का 28 से 30 फीसदी माना जाता है, इसीलिए हरियाणा में जाट किसी भी पार्टी को चुनाव जिताने और किसी भी सरकार को हराने की ताकत रखते हैं.हरियाणा की राजनीति में जाट वोटों के लिए परंपरागत तौर पर कांग्रेस और आईएनएलडी के बीच लड़ाई रही है। इस बार यह जंग जारी रहने के आसार कुछ कम हुए हैं क्यूंकि देवीलाल परिवार जिसे इनेलो के रूप में जाना जाता था आज छिन्न भिन्न होकर दो अलग अलग दलों में बंट चूका है इस लिए अब जाट मतदाताओं का बड़ा वर्ग अपना फोकस कांग्रेस और हुड्डा कि तरफ किये हुए प्रतीत होता है l

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जाटों कि भागीदारी कम करने की सोची समझी रणनीति
2014 में मनोहर लाल खट्टर को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद से आज तक बीजेपी हरियाणा में गैर जाट पार्टी की छवि से बाहर नहीं निकल पाई है. पिछले विधानसभा चुनाव में भले ही जाट वोटरों ने बीजेपी का खुलकर समर्थन न किया हो लेकिन हरियाणा में जाट वोटरों की अनदेखी मुमकिन नहीं है, यही वजह है कि पार्टी ने सुभाष बराला को प्रदेश अध्यक्ष बनाया और ओपी धनखड़ और कैप्टन अभिमन्यु जैसे कद्दावर जाट नेताओं को कैबिनेट में जगह दी. बावजूद इसके इसी साल हुए लोकसभा चुनाव में कई जाट बाहुल्य विधानसभा सीटों पर बीजेपी बढ़त नहीं बना पाई l इसका मुख्य कारण ये मन जा रहा है कि बीजेपी जिन जाट नेताओं को पद देकर उन्हें यानि कि जाटों को खुश करने की कोशिश कर रही है दरअसल जाट समुदाय उन्हें अपना नेता मानने को तैयार नहीं l इसका मुख्य कारण ये है कि जाट आरक्षण के दौरान इन नेताओं ने सरकार में होने के नाते कोई सार्थक पहल नहीं की जिससे जाटों की नाराजगी कम होती l ये नेता बस कांग्रेस और हुड्डा पर आरोप लगाने तक सिमित रहे l आज भी स्थिति कमोबेश वहीँ खड़ी है l जिससे जाटों में सरकार और बीजेपी के प्रति नाराजगी अभी बानी हुई है l जाटों को लगता है है कि बीजेपी सोची समझी रणनीति के तहत जाटों का महत्व कम कर रही है इसका एक उदाहरण ये दिया जा रहा है कि बीजेपी ने 2014 के विधानसभा चुनाव में जहाँ जाटों को 27 सीटों पर टिकट दिया था इस बार इस बार सिर्फ 20 जाट उम्मीदवारों को ही चुनावी मैदान में उतारा है.

क्या इस बार जाट वोटर बीजेपी पर भरोसा जता पाएंगे?
पिछले विधान सभा चुनाव में बीजेपी ने किसी को भी मुख्य्मंत्री का उम्मीदवार नहीं बनाया था इस लिए जाट वोटरों को लग रहा था कि कैप्टेन अभिमन्यु या ओपी धनखड़ में से कोई सीएम बन सकता है l नारनौंद विधान सभा क्षेत्र में चुनावी जनसभा में बीजेपी के तत्तकालीन राष्ट्रिय अध्यक्ष अमित शाह ने इस आशय के संकेत भी दिए थे बाद में जाट मतदाताओं को निराशा ही हाथ लगी l इस बार तो स्पष्ट है कि बीजेपी मुख़्यमंत्री मनोहरलाल को मुख़्यमंत्री के रूप में घोषित कर चुकी है तो इससे जाट वोटर बीजेपी से और बिदक सकते हैं l

हरियाणा में रोहतक, सोनीपत, पानीपत, जींद, कैथल, सिरसा, झज्जर, फतेहाबाद, हिसार और भिवानी जिले की करीब 32 विधानसभा सीटों पर जाटों का अच्छा प्रभाव है, जहां वो हार-जीत का फैसला करते हैं. बीते लोकसभा चुनाव में जाट बाहुल्य कुछ विधानसभा सीटों पर बीजेपी पिछड़ गई थी. इनमें से एक सीट थी नारनौद जो बीजेपी के जाट नेता एवं कैबिनेट मंत्री कैप्टन अभिमन्यु की विधानसभा क्षेत्र है. जबकि दूसरे जाट नेता और कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश धनकड़ की सीट बादली में भी यही हाल था. इसी तरह गढ़ी सांपला-किलोई, बेरी और महम में भी बीजेपी पीछे रही थी. गढ़ी सांपला-किलोई विधानसभा से भूपेंद्र सिंह हुड्डा विधायक हैं. इससे ये लगता है कि लोकसभा चुनाव में बीजेपी की आंधी के बावजूद उससे जाटलैंड में वोटर पूरी तरह से नहीं सधे थे.

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