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हरियाणा मे कांग्रेस की नजर जाट और दलित वोटों पर तो बीजेपी करेगी गैर जाट वोटों का ध्रुवीकरण, मोदी मैजिक के भरोसे 75 प्लस का नारा।

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हरियाणा की राजनीति में पहली बार टूटा है जाटों का वर्चस्व।
 हरियाणा विधानसभा चुनाव जीतने के लिए बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने अपना-अपना जाति गणित लगा लिया है. जाट बनाम नान जाट की पॉलिटिक्स वाला एजेंडा सेट है. कांग्रेस ने भूपेंद्र हुड्डा और कुमारी शैलजा के बहाने यहां के सबसे बड़े वोटबैंक जाट और दलित को साधने का प्लान तैयार किया है तो बीजेपी के सीएम मनोहरलाल खट्टर की पहचान यहां सबसे बड़े गैर जाट लीडर के रूप में स्थापित हो चुकी है, जाट आरक्षण आंदोलन की यादें अब भी जाट और गैर जाट के जख्म को हरा करती रहती हैं. अभी छोटी पार्टियों का जातीय समीकरण आना बाकी है।
हरियाणा में जाति पाति का गुणा भाग।
हरियाणा में लंबे समय तक कांग्रेस का शासन रहा है. लेकिन अब वो यहां अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रही है. इसीलिए ना-ना करते-करते भूपेंद्र सिंह हुड्डा  के हाथ ही कांग्रेस को कमान सौंपनी पड़ी। बीजेपी ने यहां की कुल 90 विधानसभा सीटों में से 75 से अधिक जीतने का लक्ष्य रखा है, तो कांग्रेस चरम पर पहुंच चुकी अंदरूनी कलह के बीच बीजेपी को सत्ता से बाहर करने की कोशिश में चुनावी जंग में उतरेगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस की कमान हुड्डा और शैलजा कुमारी के हाथ में आने के बाद हालात कुछ बदलते नजर आ रहे हैं. दरअसल, हुड्डा जाट और शैलजा दलित वोटबैंक को साधने की कोशिश में जुटे हुए हैं. बीजेपी के आत्मविश्वास के सामने कांग्रेस को जाति का बड़ा सहारा दिख रहा है. प्रदेश में 27 फीसदी जाट और 20 फीसदी से अधिक दलित हैं.  शैलजा  हरियाणा की दोनों सुरक्षित सीटों सिरसा और अंबाला से सांसद रह चुकी हैं।
सबसे बड़ा जाट लीडर कौन?
हरियाणा की सियासत जाटों के इर्द-गिर्द घूमती रही है. चौटाला परिवार में फूट के बाद इंडियन नेशनल लोकदल बिखर चुकी है. इनेलो जाटों की सबसे बड़ी पार्टी मानी जाती थी. लेकिन इस समय इनेलो के 10 वर्तमान विधायक बीजेपी में शामिल हो चुके हैं. जबकि जन नायक जनता पार्टी में शामिल हुए 4 विधायक अयोग्य घोषित कर दिए गए हैं। इनेलो के पास सिर्फ तीन विधायक बचे हैं. ऐसे में सबसे बड़े जाट लीडर के रूप में हुड्डा उभरे हैं।
बीजेपी का जातीय संतुलन
बीजेपी का निशाना गैर जाट वोटर हैं, जब से इस प्रदेश में मनोहरलाल खट्टर सीएम बने हैं तब से वो गैर जाट पार्टी की छवि से बाहर नहीं निकल पाई है. हालांकि, सुभाष बराला को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर और कैबिनेट में दो मंत्रियों कैप्टन अभिमन्यु व ओम प्रकाश धनखड़ को जगह देकर बीजेपी यह संदेश देने की कोशिश करती रही है कि वो सबको साथ लेकर चल रही है.  वैसे बीजेपी को इस समीकरण से अधिक मोदी लहर का भरोसा है, क्योंकि वो हरियाणा के प्रभारी भी रह चुके हैं। जातियों के सियासी मकड़जाल के बीच बीजेपी 75 प्लस का नारा कैसे साकार कर पाएगी. लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी जाट बहुल सीटों पर गैर जाट प्रत्याशी उतारकर गैर जाट वोटों का ध्रुवीकरण करने में कामयाब रही थी. सभी बड़े जाट नेता हार गए थे। ऐसे में जाटों को बीजेपी के साथ जोड़ पाना आसान नहीं होगा. विधानसभा चुनाव में भी पार्टी यह फार्मूला अपना सकती है. हालांकि, पार्टी प्रवक्ता राजीव जेटली का कहना है कि बीजेपी सभी वर्गों को साथ लेकर चलती है. सभी को मान-सम्मान देती है।

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