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हरियाणा

क्रोधाग्रि सर्वनाथ की जड़ है: आचार्य सुरेश कौशिक

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भिवानी, 15 मई। स्थानीय कीर्ति नगर स्थित सांस्कृतिक सदन में भागवत कथा
के दूसरे दिन का शुभारंभ मुख्य यजमान पुष्पा गुप्ता, आटो यूनियन के
अध्यक्ष रामनिवास शर्मा, रितेश मित्तल बापोडिय़ा एवं सांस्कृतिक मंच की
अध्यक्ष अनीतानाथ ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित करके किया।
सुप्रसिद्ध कथावाचक सुरेश कौशिक ने बताया कि श्रीमदभागवत कथा की गंगा
प्रवाहित करने के लिए भगवान में शौनक-सनकादि से वरदान मांगने को कहा तो
उन्होंने भगवान से भी सभी भक्तों के हृदय में वास करने का वरदान मांगा।
भगवान विष्णु ने 24 अवतारों में से एक भगवान वेदव्यास को वेद, वेदांग,
सहिताओं, 17 पुराण महाभारत आदि की रचना के पश्चात भी संतुष्टि नहीं हुई
तो उन्होंने नारद जी की प्रेरणा से श्रीमदभागवत महापुराण की रचना की।
आचार्य कौशिक ने बताया कि नारद जी दासी पुत्र थे। मात्र छह वर्ष की आयु
में चातुर्मास प्रवास के दौरान भगवत कथा श्रवण से उनमें भक्ति का उदय
हुआ। अगले जन्म में दिव्य शरीर नारद रूप में भगवद कृपा से मिला। कथा में
बताया कि शिवजी के गले में पार्वती के पूर्वजन्मों के मुण्डमाला पहनने,
अमर कथा श्रवण, शुकदेव का जन्म, सरस्वती नीर पर पिता वेदव्यास द्वारा
रचित भागवत स्वाध्याय, परीक्षित का जन्म, कथा में आज महाभारत की कथा का
वर्णन विस्तार से किया गया। किस प्रकार से पांडवों के रक्षार्थ भगवान
द्वारा द्रोपदी को भीष्म के शिविर में  जब भेजा तो अखण्ड सौभाग्यवती का
वरदान बड़ी योजना से दिलाया गया। आचार्य श्री ने बताया कि यदि घर में कोई
चोर-चोरी करता है तो कुछ छोड़ जाता है लेकिन अग्रि से सब कुछ नष्ट हो
जाता है। इसलिए क्रोध अग्रि है। इसलिए क्रोधाग्रि सर्वनाश की जड़ है।
तत्पश्चात उपस्थित श्रोताओं ने भक्ति सागर में डुबकी लगाई। समय के प्रभाव
पर प्रकाश डालते हुए बताया कि श्रीकृष्ण के गोलोकधाम गमन के पश्चात
अर्जुन का गांडीव कुंद हो गया और भीलों ने उनके साथ आई द्वारका की
स्त्रियों को लूट लिया। कथा के रोचक प्रसंगों पर प्रकाश डालते हुए कलयुग
आगमन के संकेत पाकर युधिष्ठिर ने परीक्षित का राज्याभिषेक किया और
स्वर्गारोहण हेतु प्रस्थान किया। द्रौपदी व चारों भाईयों की मृत्यु के
पश्चात युधिष्ठिर सशरीर स्वर्ग पहुंचे। ग्रंथ पूजन डा. सत्यवीर वत्स,
ठाकुर अनुपाल एवं ऊषा, स्नेहलता एवं डा. सतबीर वत्स ने किया। संगीतमय कथा
में मनु दूबे एवं शिवनारायण ने ढोलक पर संगत देकर मधुर भजनों से श्रोताओं
का रसास्वादन किया। इस अवसर पर सुरजभान खरकिया, संगीतकार तरसेम लाल, डा.
बुद्धदेव आर्य, संतोष भारद्वाज, सुषमा दीक्षित, श्रीमती शशि परमार,
संस्कृत अध्यापिका कल्पना, कल्पना त्यागी, राज, पूनम व कमला आदि मौजूद
थे।

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