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मिलिए ऐसे नेताओं और अफसरों से जो शपथ पूर्वक करते है संविधान का उलंघन

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” मैं, अमुक, ईश्वर की शपथ लेता हूँ/सत्यनिष्ठा से प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूँगा, मैं भारत की प्रभुता और अखंडता अक्षुण्ण रखूँगा, मैं संघ के मंत्री के रूप में अपने कर्तव्यों का श्रद्धापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण से निर्वहन करूँगा तथा मैं भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना, सभी प्रकार के लोगों के प्रति संविधान और विधि के अनुसार न्याय करूँगा। “

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उपरोक्त शपथ लेने वाला व्यक्ति यदि न केवल संविधान का उलंघन करे, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवमानना करे तो आप इसे क्या कहेंगे ? ऐसे अनपढ़ या नासमझ मंत्रियों की बात तो समझ में आती है लेकिन पढ़े लिखे होने का दम्भ भरने वाले IAS अधिकारीयों (जिनके कन्धों पर संविधान की रक्षा के जिम्मेदारी है) के बारे में आप क्या कहेंगे जो अपनी कार्यप्रणाली से संविधान की भावनाओं से खिलवाड़ करते हैं। संविधान का इस तरह का खिलवाड़ तब और तकलीफ देह होता जब संविधान निर्मात्री सभा के अध्यक्ष डॉ. भीम राव आंबेडकर के नाम के साथ साथ इसका जुड़ाव हो।

ऐसे अनेकों मामले आये दिन देखने को मिल रहे हैं। ताज़ा मामला महाराष्ट्र व गुजरात सरकार द्वारा गरीबों के के उत्थान के नाम पर ” भारत रत्न डॉ. भीम राव आंबेडकर विशेष सामूहिक प्रोत्साहन योजना ” शुरू की गई है। जनहित में ऐसी योजनाओं को शुरू करते वक्त नेता लोग अक्सर उसके नामकरण का कानूनी पहलु का ध्यान जरूरी नहीं समझते वहीं पढ़े लिखे आईएएस अफसर और कानून विद भी संविधान की उलंघना के साथ सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवमानना करते है।
महाराष्ट्र व गुजरात सरकार द्वारा शुरू की गई भारत रत्न डॉ. भीम राव आंबेडकर विशेष सामूहिक प्रोत्साहन योजना में भी ठीक ऐसा ही हुआ है। स्काउट्स एंड गाइड के राष्ट्रिय आयुक्त नरेश कादियान ने इस आशय की एक शिकायत इन दोनों सरकारों के गृह विभाग/गृह मंत्रालय और उद्योग विभाग को की है। श्री कादियान ने इस योजना के नाम को असंवैधानिक बताते हुए डॉ. भीम राव आंबेडकर के नाम से पूर्व भारत रत्न लिखे जाने को संविधान की धारा 18 (1) की उलंघना व सुप्रीम कोर्ट  अवमानना बताया है।

दरअसल इसकी वजह सुप्रीम कोर्ट का वो जजमेंट है जो 23 वर्ष पूर्व 15 दिसम्बर 1995 को माननीय सुप्रीम कोर्ट के एक संवेधानिक बेंच ने “बालाजी राघवन बनाम भारत सरकार” नामक केस में दिया था। इस निर्णय में स्पष्ट किया गया था कि भारत सरकार द्वारा प्रदान किये जाने वाले चार राष्ट्रीय अवार्ड अर्थात भारत रत्न, पद्म विभूषण, पद्म भूषण एवं पद्मश्री को किसी भी प्रकार से नाम से साथ उपाधि के तौर पर प्रयोग नहीं किया जा सकता है। अगर ऐसा होता है तो यह संविधान की धारा 18 (1) की उलंघना की श्रेणी में आएगा। इस सारे मामले की जड़ में सुप्रीम कोर्ट का यही फैसला है।

 

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है इससे पहले दिल्ली सरकार भी भारत रत्न डॉ. भीम राव आंबेडकर यूनिवर्सिटी के नामकरण में संविधान की अवहेलना कर चुकी है जो स्काउट्स एंड गाइड के राष्ट्रिय आयुक्त नरेश कादियान के एतराज के बाद भारत रत्न को हटाया गया था, लेकिन UGC द्वारा ग्रांट में अभी भी नाम वही है।

गत्त वर्ष पूर्व प्रधान मंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के 94 वे जन्मदिन पर केंद्र की भाजपा सरकार सहित विभिन्न राज्यों की सरकारों द्वारा जारी विज्ञापन को असंवैधानिक बताते हुए, विज्ञापन जारी कर्ताओं पर कानूनी कार्रवाई करने और इस विज्ञापन का भुगतान रोकने की मांग भी की स्काउट्स एंड गाइड के राष्ट्रिय आयुक्त नरेश कादियान ने की थी। श्री कादियान ने अटल बिहारी वाजपेयी के 94 वे जन्मदिन पर जारी विज्ञापन को संविधान की धारा 18 (1) की उलंघना बताया था।

यहाँ ये बताना भी अति आवश्यक है कि भारत रत्न से सम्मानित पूर्व प्रधान मंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की स्मृति में भारत सरकार ने उनकी फोटो युक्त सिक्का जारी करने के समारोह में शामिल प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी, लोकसभा अध्यक्ष श्रीमती सुमित्रा महाजन, वित्त मंत्री अरुण जेटली, कल्चरल अफेयर राज्य मंत्री महेश शर्मा, सांसद अमित शाह व लाल कृष्ण अडवाणी वाजपेयी परिवार के सदस्यों सहित तमाम उपस्थित गणमान्य व्यक्ति के खिलाफ सिक्का समारोह में समारोह के मुख्य बैनर की शब्दावली को संविधान की धारा 18 (1) की उलंघना की शिकायत  केंद्रीय गृह विभाग/गृह मंत्रालय को की जा चुकी है। श्री कादियान ने अटल बिहारी वाजपेयी की स्मृति में जारी सिक्का समारोह में समारोह के मुख्य बैनर की शब्दावली को संविधान की धारा 18 (1) की उलंघना बताया था।

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