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न पंजाब की रै-रै ना कोर्ट का झमेला, हिमाचल के रास्ते सतलुज-सरस्वती मिलन की बेला

एसवाईएल को हिमाचल के रास्ते से लाने से ही सरस्वती नदी का पूर्नजन्म संभव: जितेन्द्र नाथ

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भिवानी, 4 जनवरी। एसवाईएल पर पंजाब हमेशा अपनी भंवें ताने रहता है उसे लगता है कि अगर नहर बनी तो पानी कि अधिक मात्रा हरियाणा को देनी होगी जो वह देना नहीं चाहता। पानी देने कि बात तो तब सिरे चढ़ सकती है जब वह जमीन देने को तैयार हो सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद पंजाब येन-केन-प्रकरेण नहर की खुदाई नहीं होने दे रहा। यहाँ तक कि अधिग्रिहत की गई जमीन किसानों को वापसी का अध्यादेश जारी कर दिया। अगर इसी तरह यह विवाद राजनीति का शिकार होता रहा रहा तो हरियाणा के किसानों को उसके हिस्से का पानी मिलने आशाएं धूमिल ही नज़र आती है।
फिर क्या मन लिया जाये कि हरियाणा को उसके हिस्सेका पानी कभी नहीं मिलेगा। लेकिन एक और समाधान भी है।वह है लिंक नहर का रास्ता बदल कर वाया हिमाचल कर दिया जाये।फिर ना तो पंजाब की रै-रै होगी और नाही कोर्ट का कोई झमेला।

यहाँ यह भी बता दें कि हिमाचल के रास्ते सतलुज से हरयाणा को जोड़ने के लिए लिंक नहर कि लम्बाई केवल 67 किलो मीटर जबकि पंजाब के रास्ते यह लम्बाई 156 किलो मीटर बनती है। पंजाब उपजाऊ जमीन की आड़ में जब अपनी जमीन नहीं देना वही हिमाचल के लिए यह किसी तोहफे से कम नहीं होगा। क्योंकि पथरीली और पहाड़ी जमीन का अच्छा खासा मुआवजा वहां के किसानों की खुशहाली का सबब बन सकता है वहीं नहर के निर्माण में हज़ारों कि संख्या में रोजगार भी मिलेगा।

हरियाणा सरकार की सरस्वती नदी के जीर्णोदार की कोशिशें भी हिमाचल के रास्ते से एसवाईएल निर्माण से फलीभूत हो सकती हैं। एक पंथ दो काज की कहावत यहाँ पर चरितार्थ हो सकती है।

सरस्वती नदी के पूर्नउत्थान के लिए सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं पर बोलते हुए एसवाईएल हिमाचल मार्ग समिति के अध्यक्ष जितेन्द्र नाथ ने बताया कि असल जानकारी नासा, भूगर्भ विज्ञान विभाग अमेरिका सरकार, आईआईटी कानपूर, जियो लोजिकल डिपार्टमैन्ट ऑफ ईम्पीरियल कालेज लंदन द्वारा सरस्वती नदी पर किए गए अनुसंधान के अनुसार मौजूदा
सतलुज नदी जो पंजाब में से होकर बह रही है।

 सात हजार वर्ष पूर्व घघर नदी, टांगरी नदी, सरस्वती नदी, मारकन्डा नदीयों के रास्ते से होकर गुजरती थी,
जिसने भूगोलिक गतिविधियों के कारण सतलुज नदी ने 150 किलो मीटर पश्चिम की
तरफ अपना रास्ता बदल लिया। जिस कारण उपरोक्त नदीया एक बरसाती नदीयों में
तबदील हो गई और यह मान लिया गया कि सरस्वती नदी विलुप्त हो गई है। इसी
संदर्भ में एसवाईएल हिमाचल मार्ग समिति ने जनवरी 2017 में जो प्रस्ताव सरकार के सामने प्रस्तुत किया था। इस प्रस्ताव के तहत भाखड़ा डैम से निकलने वाली सतलुज नदी में से हिमाचल के रास्ते नैना नदी, नाला गढ, बदी, पींजोर तक जो केवल 67 किलोमीटर पड़ता है

जिसमें पंजाब का कहीं दखल
नहीं रहता। हरियाणा में पहूंचने के बाद एसवाईएल पंचकूला से टांगरी नदी
में पानी छोडऩे के उपरान्त जनसुई हैड तक पंहच जायेगा। जिससे पूरे
कुरूक्षेत्र, अम्बाला जिलो में सरस्वती नदी का पूर्नजन्म हो जाऐगा।
क्योंकि सतलुज का पानी इस रास्ते से हरियाणा में आ जाऐगा और जनसुई हैड से
पहले से बनी हुई एसवाईएल हो करके वह अपना पानी दक्षिण हरियाणा के अन्तिम
छोर तक पहुंच जाऐगा। इसलिए इस विषय पर संज्ञान लेने का कष्ट करे। जिससे
हरियाणा के पैंतीस लाख एकड़ जमीन को 24 घण्टे पानी मिलेगा और कैलाश
मानसरोवर से सीधा पानी देवभूमि हिमाचल के रास्ते हरियाणा की धरती को मिल
पायेगा। उन्होंने बताया कि सन 1960 में हुए भारत-पाक समझोते में रावी,
ब्यास, सतलुज नदीयों की एक-एक बूंद भारत के हिस्से में आ गई थी लेकिन
दुभाग्र्यवश लाखो क्यूसिक पानी पाकिस्तान जा रहा है जोकि हमारे हक का है।
हमारे खेत खलीयान एक-एक बूंद पानी को तरस रहे है तथा पानी आने से लाखों
लोगों को रोजगार मिलेगा।

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