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2019 के चुनाव की दस्तक, नेताओं को फिर वोटरों के दरवाजे पर कर दिया खड़ा

चुनाव नजदीक आते ही नेताओं को आई जनता की याद, दु:ख-दर्द में बनने लगे हमदर्द

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पांच वर्ष तक जो नेता जनता के बीच से रहते हैं गायब, मौसमी मेढक़ की तरह आने लगे सामने

पांच साल तक जनता के वोट पर ऐस करने वाले नेताओं को अब फिर से उनकी दिक्कत और परेशानियों की सताने लगी है चिंता

महेंद्रगढ़ (प्रिंस लांबा)। नेताओं के मुहं से एक बार फिर जनता के दु:ख-दर्द की बात सुनकर लोगों को ऐसा लगने लगा है कि हरियाणा प्रदेश में 2019 विधानसभा चुनाव की तैयारियां जोरों से शुरू होने लगी हैं। पांच साल तक जनता के वोटों पर ऐस करने वाले नेताओं को अब फिर से उनकी दिक्कत और परेशानियों की चिंता सताने लगी है और इस काम में सत्ता में काबिज पार्टी के साथ वो पार्टियां भी जनता से सरोकार रखने वाले मुद्दों पर अपनी राय रखने के लिए दुकाने सजाने लगीं हैं जो सत्ता के सुख को भोगने के जुगाड़ में लगी है।

 

 महेंद्रगढ़ में लोगों द्वारा सत्ताधारी पार्टी को समर्थन देने के पीछे केवल एक ही उद्देश्य था कि महेंद्रगढ़ का विकास हो। लेकिन पिछले चार सालों में महेंद्रगढ़ की जो हालत थी वो जस की तस है। हालांकि 2019 के चुनाव की दस्तक ने फिर से नेताओं को वोटरों के दरवाजे पर खड़ा कर दिया है। महेंद्रगढ़ विधानसभा में आए दिन विपक्षी पार्टियों के नेता जो विकास कार्य बीजेपी सरकार में शुरू भी नहीं हुए हैं, सत्ता में आते ही उन कार्यों को जनता तक पहुंचाने का दम भरते दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में जनता को फिर से बरगलाने के प्रयास तेज हो गये हैं और आमजन को वह सब भूलने के लिए मनाया जा रहा है जिन वादों के रथ पर सवार होकर पार्टियां सत्ता के सुख का आन्नद लेती हैं और चुनाव के तुरंत बाद फिर से वादे पूरे करने का लालच दिया जाता है।

हालांकि इस काम में पार्टियों के झंडों के केवल रंग ही बदलते हैं लेकिन हकीकत में उनके चाल और चरित्र में अंतर निकाल पाना शायद जनता के लिए मुश्किल है। चुनाव नजदीक आते ही नेताओं को जनता की याद आ जाती है परंतु विकास के लिए काफी लंबे समय से चल रहे विभिन्न समस्याओं पर इन्होंने लोगों के हक में कोई आवाज तक नहीं उठाई। नेता जितना समय सैलिब्रिटीस के साथ बिताते हैं, उतना अगर उन्होंने जनता के साथ बिताया होता तो लोगों की अपने हकों के लिए आवाज नहीं उठानी पड़ती। ये नेता जनता से झूठे वादे करके सत्ता में तो आ जाते हैं परंतु सत्ता सुख भोगने में इनते लीन हो जाते हैं कि इनको यह तक याद नहीं रहता की वे किसकी बदौलत आज इस कुर्सी पर बैठे हैं परंतु जैसे ही चुनाव का समय नजदीक आता है फिर ये नेता जनता पर जान वारने तक को तैयार रहते हैं।

 

देश का नेतृत्व करना सब के वश की बात नहीं होती। यह काम नेताओं का होता है, एक नेता वह होता है जिसके दिमाग में सदैव समाज के विकास की दूरदर्शी योजनाएं होती हैं। उसकी जिंदगी का हर एक मिनट अपने देश की तरक्की और नए मुकाम हासिल करने के रास्तों पर विचार करने में बीतता है। त्याग, बलिदान और जनता के दु:ख-दर्द में भागीदार बनना कोई नहीं चाहता। बस चुनाव के समय ही इन नेताओं को जनता के दु:ख-दर्द याद आते हैं। चुनावी सभाओं मे बड़े-बड़े शब्दों का प्रयोग कर जनता को बरगलाने की कोशिश सभी नेता करते हैं लेकिन हकीकत में राजनीति की गन्दी चाल चलकर कुर्सी पाना ही इनका मूल मकसद होता है। एक बार कुर्सी मिली नहीं कि पांच वर्ष तक जनता को ही उनके दरबार में हाथ बांधे, सर झुकाए खड़ा रहना पड़ता है।

 

देखा जाए तो जो नेता पांच वर्ष तक जनता के बीच से गायब रहते हैं वे चुनावी मौसम आते ही मौसमी मेढक़ की तरह जगह-जगह जनता के बीच जाकर उनके हमदर्द बन समर्थन पाने के लिए आमजन को मुर्ख बनाने में जुट गए हैं। अब देखना यह होगा कि जनत ा विकास क नाम पर वोट मांगने वाले इन मौसमी मेढक़ रूपी नेताओं के झांसों में आती है या नहीं? सवाल यह भी है कि एक-दूसरे के नुक्ताचीनी करने मे फंसे देश-प्रदेश के नेताओं को आम जनता में बनी नकारात्मक छवि को बदलने के प्रयास नहीं करने चाहिए? सच मानिए तो इसी में उनका और देश का भला है।

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