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वजन तो दीखता है दलित प्रधानमंत्री की चर्चा में

छह साल से बसपा सुप्रीमो काट रही हैं राजनीती के दुर्दिन

राजनीति संभावनाओं का खेल है. सपा -बसपा के गठबंधन को उत्तर प्रदेश उपचुनाव में मिली अपार सफलता के बाद बसपा सुप्रीमो सुश्री मायावती के गर्दिश में चल रहे राजनैतिक सितारे चमकने लगें तो किसी को कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए । इस गठबंधन में अगर कांग्रेस भी शामिल हो जाये ( जिसकी सम्भावनाएँ भी बन रही हैं .) तो यह तिकड़ी बीजेपी को मजबूत टक्कर दे सकती है । लेकिन अभी से ऐसा आकलन दूर की कौड़ी होगी क्योंकि बहुत कुछ दलितों आदिवासियों की खासी संख्या वाले मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव के नतीजों पर निर्भर करेगा जहाँ कांग्रेस और बसपा के बीच सीटों के बंटवारे पर बातचीत चल रही है.
अगर कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के गठबंधन को अगले आम चुनाव में भाजपा के खिलाफ कामयाबी मिलती है तो मायावती अपनी नई छवि के बूते प्रधानमंत्री पद के लिए दावा करने में नहीं हिचकेंगी .
इन दोनों राज्यों में बसपा की मजबूत मौजूदगी है और 2013 में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों का विश्लेषण दिलचस्प है.
जानकार मानते हैं कि अगर मध्य प्रदेश में कांग्रेस-बसपा गठबंधन बनाकर चुनाव लड़े होते बीजेपी की 40 सीटें कम हो जातीं.
छत्तीसगढ़ में दोनों साथ लड़े होते तो भाजपा से 3.5 प्रतिशत वोट ज्यादा मिले होते.
सूत्रों के मुताबिक मायावती आत्मविश्वास के साथ तगड़ी सौदेबाजी कर रही हैं. उन्होंने जता दिया है कि अगर सम्मानजनक सीटें मिलती हैं तभी साथ लड़ेंगी वरना उन्हें अकेले चुनाव लड़ने से भी गुरेज नहीं है.
इन दोनों राज्यों के साथ तीसरे चुनावी राज्य राजस्थान को भी जोड़ लें तो ये क्षेत्र कुल 66 लोकसभा सीटों के दायरे में फैला हुआ है. इन पर बसपा का प्रदर्शन अच्छा रहा तो मायावती की स्थिति गठबंधन के भीतर और बाहर मजबूत होने के साथ दलित प्रधानमंत्री की चर्चा में वजन आ जाएगा.

अगर ऐसा हो पाया तो छह सालों तक दुर्दिन काटने के बाद मायावती की चुनावी राजनीति दमदार वापसी होने वाली है वरना वे सिर्फ़ यूपी के जाटवों की नेता होकर रह जाएँगी.
दलितों की एकक्षत्र नेता बनी तो दलित प्रधान मंत्री की मांग पकड़ सकती जोर

इस समय मायावती और उसकी पार्टी की हालत बहुत कमजोर है . मायावती यूपी में पिछले तीन चुनाव बुरी तरह हारी हैं, लोकसभा में बसपा का एक भी सांसद नहीं है लेकिन उनके प्रधानमंत्री बनने की चर्चा शुरू हो गई है.

सपा के अखिलेश यादव के साथ सुलह के बाद, मोदी सरकार के खिलाफ बन रही विपक्षी एकता की एक नेता के रूप में उभर रहीं मायावती की सियासत दोबारा परवान चढ़ती दिख रही है. वे देश की पहली दलित प्रधानमंत्री और दूसरी महिला प्रधानमंत्री के सपने को भरपूर हवा देना चाहती हैं. इसी लिए उन्होंने इस दिशा में काम भी शुरू कर दिया है . वे जानती हैं कि उनकी इस वक़्त वाली छवि से काम नहीं चलेगा, इसके लिए उन्होंने अपनी छवि बदलने के प्रयास शुरू कर दिए हैं.

मायावती की छवि का मसला
अगला आम चुनाव जैसे-जैसे करीब आएगा, कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के गठबंधन के ठोस शक्ल लेने के साथ दलित संगठनों की ओर से मायावती को प्रधानमंत्री बनाने की माँग तेज होती जाएगी.
बसपा सुप्रीमो मायावती के साथ कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी
लेकिन इससे पहले भाजपा शासित तीन राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में बसपा और कांग्रेस का साझा प्रदर्शन अहम भूमिका निभाएगा.

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