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सेमीनार : किसानों की आय बढ़ाने, बम्पर फसल लेने व चावल क़ी फ़सल को जहर मुक्त करने की जानकारी दी

राजकुमार खुराना
तरावड़ी 13 जून | कीटनाशकों का अधिक इस्तेमाल किसानों व राईस एक्सपोर्टो के लिये नुक्सान साबित हो रहा है कभी विदेशों में भारत का बासमती चावल धाक जमाने वाला अब पाकिस्तान के चावल से मात खा रहा है। यूरोप बौर खड़ी देशों मे हमारे चावल मे अधिक पैस्टीसाईड होने की वजह से रिजेक्ट कर दिया जाता है जोकि आने वाले समय मे भारत के राईस एक्सपोर्टो के लिये चिंता का विषय है। यह शब्द आल इडिया राइस एक्सपोर्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष विजय सेतिया ने गलैक्सी बासमती राईस के सौजन्य से किसान भाईयों के लिये नई अनाज मंडी तरावड़ी मे आयोजित एक सेमीनार मे बोल रहे थे। इस   विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा. वी.पी. सिंह आईएआरआई, डा. राकेश सेठ,आईएआरआई, डा. विपिन कुमार केवीके, मि. राजन सनदर्शन एआईआरईए, विजय सेतिया, आल इङ्क्षडया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन सेमीनार मे मुख्यअथिति के रूप मे शिरकत की। इन्होने इस सेमीनार आये हुये किसानों व मंडी के आढतियों को फसल को किस तरह से हमे बीजों का चुनाव व उनको लैब द्वारा टैस्ट करवाना व बिना कीटनाशकों दवाईयों के द्वारा धान की खेती करना, अपने ही खेत मे अपनी खेतों के लिये खुद बीज तैयार करना के बारे विस्तृत जानकारी दी। इस कार्यक्रम मे विधायक भगवान दास कबीरपंथी ने भी मुख्यअतिथि रूप मे भाग लिया। इस कार्यक्रम का आयोजन गलैक्सी बासमती चावल के सौजन्य से आल इंडिया राइस एक्सपोट्र्स एसोसिएशन, राइस मिलर एसोसिएशन तरावड़ी, आढ़ती एसोसिएशन व न्यू ग्रेन मर्चेन्ट एसोसिएशन तरावड़ी की ओर से संयुक्त रूप से किया गया। इस अवसर विनोद गोयल, विजय गोयल, कृष्ण गोयल ने गलैक्सी परिवार की ओर से आये हुये सभी मेहमानों को स्मृति चिन्ह देकर सम्मान किया।
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यूरोप के देशों में हर साल चार लाख टन चावल की मांग रहती है तीन साल पहले तक भारत से यह मांग पूरी हो रही थी मगर अब यह मांग पाकिस्तान की ओर शिप्ट हो गई है। भारत अब केवल इन देशों मे तीन हजार टन ही निर्यात कर रहा है पिछले तीन चार साल मे इसकी कोई बढोतरी नही हुई। आल इडिया राइस एक्सपोर्ट एसों के अध्यक्ष ने बताया कि भारत के सात प्रदेश जे.के.,पंजाब, हरियाणा, यू पी, हिमाचल और उतराखंड मे बासमती चावल होता है जो विदेश जाता है। पाकिस्तान मे 19 जिलों मे बासमती चावल होता है फिर भी उसके चावल की मांग विदेशों बढ़ रही है क्योकि वहां के किसान पेस्टीसाइड का प्रयोग नही करते।

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